आज के दौर की सबसे बड़ी बिमारी कोढ़ या तपेदिक नहीं है बल्कि अपने को गैर-जरुरी महसूस करने का भाव है!दुःख का असली कारण आत्मा या प्रकृति नहीं,बल्कि मनुष्य की तृष्णा है!

माँ का आँचल |


कष्टदायी प्रसव पीड़ा , मातृत्व स्नेह के लिए
सिर्फ और सिर्फ माँ ही कर सकती है |

अपनी शरीर के लहू से हमें सींचती ,
वगैर कोई परवाह किए ,
आने वाले संतान के
सुख पर सब कुछ न्योछावर
सिर्फ और सिर्फ माँ ही कर सकती है |

निस्वार्थ प्रेम निर्मल ममता
विराट ह्रदय ,सुख समृधि बरसाती
देवी स्वरूपा , ज्ञानमयी ,पवित्रता के प्रतीक
गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कराती
आँचल में समेटकर ,रात को लोरी सुनाती
सिर्फ और सिर्फ माँ ही कर सकती है |

आँखों में शीतलता ,चेहरे में गंभीरता
ह्रदय में सहिष्णुता ,बातों में मधुरता
आँचल जैसे सम्पूर्ण आकाश की छत्रछाया
माँ श्रृष्टि का एक मात्र सच ,जो इश्वर के समकक्ष है |
इश्वर तो अदृश्य है पर माँ मानस पटल पर सदा बिचरण करती है
वो मानो ह्रदय में निवास करती है |
संकट से परे ,वो अपने हित की नहीं
अपने लाडले के भविष्य की सोचती
ऐसा सिर्फ और सिर्फ माँ ही कर सकती है |



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जातीय भावनाओं का दोहन
ताऊ .इन

Comments :

1
Ratan Singh Shekhawat said... on 

सही लिखा है आपने ! माँ माँ ही होती है माँ जैसा कोई नहीं !!

बहुत बढ़िया और उम्दा रचना !!

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