आज के दौर की सबसे बड़ी बिमारी कोढ़ या तपेदिक नहीं है बल्कि अपने को गैर-जरुरी महसूस करने का भाव है!दुःख का असली कारण आत्मा या प्रकृति नहीं,बल्कि मनुष्य की तृष्णा है!

एलो बॉडी टोनर ( अपनी त्वचा को रेशमी कोमलता दें )


हमारी त्वचा बेहतरीन सुरक्षा का अधिकारी है - आखिरकार क्या ये आप के शरीर का सबसे उजागर लेकिन सबसे कम सुरक्षित भाग नहीं है ? जरा कल्पना करें की कैसे दिनों, महीनो और सालों तक यह वक्त की सारी ताडनाएं सहता है , ज्यादातर चुपचाप और कभी-कभी फोड़ों, घावों या फिर सुस्त और निर्जीव त्वचा दर्शाते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त करता है | शरीर का यह सबसे बड़ा अवयव चुपचाप बदलते मौसम, धुल-मिट्टी, प्रदुषण, रासायनिक उत्सर्ग, कठोर पदार्थ, अस्वस्थ्य जीवन शैली, बढती उम्र इत्यादि के थपेड़े सहता है | क्या ये अच्छा नहीं होगा अगर हम अपने व्यस्त दिनचर्या में कभी-कभार थोडा सा वक्त अपने शरीर के इस महत्वपूर्ण एवं प्रत्यक्ष अंग को सँवारने और सुरक्षा में लगाएं |

एक उष्ण, फुर्ती-स्पद, आराम पहुँचानेवाले मालिश से अच्छा और क्या हो सकता है जो आप की त्वचा को न सिर्फ एक चमक प्रदान करे, बल्कि उसकी बदसूरत और उबड़-खाबड़ सतह जिससे अधिकतर लोग पीड़ित रहते है और इस से निदान का आसान व प्रभावशाली तरीका ढूंढते रहते है | तो है एक ऐसा प्रोडक्ट हमारे पास जो न सिर्फ प्रभावशाली है, बल्कि बेहद सुरक्षित एवं अंततः सस्ता भी है | जिसका नाम है फोरेवर एलो बॉडी टोनर |

एलो बॉडी टोनर शुद्ध, स्टेब्लाईज्द एलो वेरा और चुनिंदे यूरोपियन जड़ी-बूटियों का एक यथार्थ मिश्रण है जिसमे सिन्न्मन आयल और कैपसिकम - दो अनूठे हिटिंग एजेंट है |

कैपसिकम :- काफी अरसे से कैपसिकम का उपयोग न सिर्फ भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए बल्कि शरीर के सुचारू संचालन एवं शुद्धिकरण के लिए किया जाता रहा है | कैपसिकम पाचन रसों के उत्पादन में बढ़ोतरी करता है और हमारी नैसर्गिक सुरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने में सहयोग देता है | रक्तचाप को सुव्यवस्थित करने में भी मदद कर सकता है | जहाँ आप अपने शरीर के आतंरिक हिंस्सों की संचालन प्रक्रिया को मजबूत कर असंख्य कोशाणुओं को ओक्सिजन और पोषण द्वारा सक्रीय बनाते है , वहीँ कैपसिकम की उष्ण शक्ति संचालन प्रक्रिया को दुरुस्त कर फंसे द्रव्य और चर्बीदार उतकों को तोड़ती है जिससे सेल्युलाईट बनता है |

सेल्युलाईट एक ऐसी स्थिति है जो पुरुष और स्त्रियों ( खासकर स्त्रियों ) में पैदा होती है जिससे जांघों, पेट और पेल्विक रीजियन की त्वचा उबड़-खाबड़ दिखती है | इसे ओरेंज पिल सिंड्रोम, काटेज चीज स्किन, मैट्रेस फिनौमिनन इत्यादि नामों से भी जाना जाता है |

सिन्न्मन आयल :- ऐसा मन जाता है कि सिन्न्मन शरीर को संचालन प्रक्रिया और शक्ति प्रवाह को सुदृढ़ बनाता है | चीन के चिकित्सीय शास्त्र के अनुसार दर्द, ऐठन और रक्त संचय ये सभी उर्जा अवरोधी अवयव है | सिन्न्मन उर्जा को पुरे शरीर में संचालित करती है और यह उष्णता पैदा करने वाला मन जाता है | यह तीव्र एसेंशियल आयल थकावट, डिप्रेसन और कमजोरी से लड़ने में मदद करता है |

एलो बॉडी टोनर के अनूठे परिणामों का रहस्य है एलो वेरा जो हाइपोडर्मिस लेबल तक जाकर नमीं तथा चिकनाई पहुंचती है और साथ ही उष्णता पहुँचाने वाले तत्वों के साथ मिलकर अनचाहे द्रव्य पदार्थों को साफ़ करती है जिस के कारण त्वचा रेशमी और चिकनी दिखाई देती है | यह एक गहराई तक उष्णता पहुँचाने वाली एमोलिएंट क्रीम है जिसमे इमलसिफाअर्स, मोइस्च्राइजर्स और हुमेक्तेन्त मौजूद है | यह प्रोडक्ट एलो बॉडी टोनर का अभिन्न अंग है और शरीर के बिभिन्न भागों पर सेलोफिन रैप के साथ प्रयोग करने पर बेहतरीन परिणाम मिलते है | बहरहाल , चेहरा, गला, फोरआर्म , सीना, घुटनों और पिंडलियों के बिच सेलोफिन का प्रयोग न करें | त्वचा के निचले हिंस्से में फंसे द्रव्य पदार्थों को पिघलने में मदद कर जब यह प्रोडक्ट वजन कम करने के अन्य अवयवों के साथ काम करता है तो इन्च रिडक्सन में मदद मिलती है |
यह एक हर्बल पैक है । इससे आप पेट ,जंघा व बाजू पर जमा अतिरिक्त चर्बी को कम कर सकते है । यदि आपके पेट पर चर्बी काफ़ी मात्रा मे है तो यह एक घंटे मे २ इंच भी कम कर सकता है ।
त्वचा पर पडी धारियों को भी खत्म कर सकता है ।यह एक एन्टी –बायटिक कोम्बिनेशन है जो हमारी त्वचा के संक्रमण को भी कम करने मे मदद करती है । इसका कोई साइड एफ़ेक्ट नही है । यह हमारी त्वचा को स्वस्थ रखता है ।


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तो देर किस बात कि है, तैयार हो जाइए एक नए, जवाँ, छरहरे शरीर के लिए, कुछ ही घंटो में --- अपने घर के आराम और एकांत में |



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Aloe Sunscreen ( UVA & UVB Protection water resistant )


आज हम एक ऐसे उत्पाद के बारे में चर्चा करेंगे ,जो इन दिनों की भयंकर तेज धुप से त्वचा को स्वास्थ्य रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है | वैसे सूर्य हमारे जीवनदायक है | यह एक निर्विवाद सत्य है की धुप की थोड़ी सी मात्रा न सिर्फ हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है साथ ही हमारी हड्डियों के लिए जरुरी विटामिन डी की भी आपूर्ति करती है | लेकिन विज्ञानं इस तथ्य को भी प्रमाणित करता है की धुप की ज्यादा मात्रा भी हमें न सिर्फ बाहरी तौर से वृद्ध बनाती है अपितु त्वचा सम्बन्धी कई अन्य समस्याएं भी उत्पन्न करती है | साधारण शब्दों में सूर्य से निकली पराबैंगनी किरणों को प्रकाश के तरंग आयाम ( Wave Length) के आधार पर वैज्ञानिक तीन भागों में विभक्त करते है :- UVA, UVB और UVC | इनमे से UVC के संपर्क में ज्यादा देर तक रहना त्वचा के लिए घातक सिद्ध हो सकता है | सौभाग्य से वायुमंडल में उपस्थित कुछ गैसों के कारण UVC पृथ्वी पर पहुँचने से पहले ही सोख लेते है |

ऐसे में बाजार में उपलब्ध सनस्क्रीन के अवयव ज्यादातर UVB को सोख कर उन्हें ठीक उसी तरह से त्वचा में प्रवेश करने से रोक देते है जिस प्रकार से वायुमंडल में उपस्थित अवयव UVC को पृथ्वी पर पहुँचाने से पहले सोख लेते है |

लेकिन हमारी त्वचा को फोटो एजिंग और त्वचा कैंसर का विकास जैसी क्षति पहुँचाने में पराबैंगनी किरणों UVA की महत्वपूर्ण होती है | ज्यादातर सनस्क्रीन क्रीमों के द्वारा UVB को तो रोका जा सकता है पर UVA को रोकने वाली ऐसी क्रीम बहूत कम उपलब्ध है | आधुनिक अनुसंधानों से यह पता चल रहा है की किस तरह से सनस्क्रीन त्वचा की रक्षा करने में सहायक होते है | ऐसे सनस्क्रीन सूर्य की किरणों को तवचा से सोखकर, वापस फेंककर या फैलाकर कार्य करते है |

सनस्क्रीन को दो भागों में बांटा जा सकता है :- प्राकृतिक सनब्लाक्स तथा जिंक एवं टिटेनियम व केमिकल सनस्क्रीन एजेंट्स | जहाँ प्राकृतिक सनस्क्रीन पराबैंगनी किरणों की भौतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते है वहीँ केमिकल सनस्क्रीन पराबैंगनी किरणों को सोखकर उन्हें त्वचा के तंतुओं (Tissues) में निष्क्रिय करते है | प्राकृतिक सनब्लाक्स द्वारा विषैले रसायनों से मुक्त एस. पी. एफ. सुरक्षा मिलती है |

एस. पी. एफ. का मतलब है सन प्रोटेक्शन फैक्टर यानि धुप से बचाव के सहायक तत्व | ये आपकी त्वचा के जलन होने में लगने वाले समय एवं एस. पी. एफ. सुरक्षा संख्या की गुना के बराबर के समय को दर्शाता है | मान लीजिये की आपकी त्वचा बिना सनस्क्रीन के ५ मिनट में जल जाती है तो SPF 15 के साथ अब ऐसा होने में ७५ मिनट लगेंगे | लेकिन वास्तव में SPF 15 और SPF 30 की सूर्य की पराबैंगनी किरणों की शोधन करने की शक्ति में अंतर सूक्ष्म होता है | तात्पर्य यह है की यदि SPF 15 की शोधन शक्ति यदि ९६% है तो SPF 30 की तक़रीबन ९८% होगी | तो सामान्यतः एक SPF 30 वाली प्राकृतिक सनब्लाक सूर्य से बचाव के लिए पूर्ण रूप से प्रयाप्त है |

पर सनस्क्रीन फोरेवेर्लिविंग का ही क्यूँ प्रयोग करें ? बहूत ही अच्छा सवाल है | क्यूंकि कोई भी सनस्क्रीन एक ऐसा उत्पाद है जिसे आपको अपने दिन के ज्यादातर समय में महीने दर महीने ,साल दर साल प्रयोग करना है ,इसलिए ये महत्वपूर्ण है की ऐसा उत्पाद लिया जाय जो न सिर्फ हमारी त्वचा की सुरक्षा प्रदान करें बल्कि अन्दर तक ख्याल भी रखें और आराम भी पहुंचाये | फॉर एवर एलो सनस्क्रीन यह सब कुछ एक साथ देता है | आधुनिक विज्ञानं की सहायता से अधिकाधिक प्राकृतिक तत्वों को मिलकर यह एक ऐसा सनस्क्रीन है जो आपकी त्वचा को आराम पहुंचाता है, तरलता और नमी प्रदान करता है और साथ ही धुप और हवा के दुष्प्रभावों से आपकी रक्षा करता है | SPF 30 युक्त फार्मूला फॉर एवर एलो सनस्क्रीन प्रभावशाली ढंग से UVA और UVB किरणों को रोकता है और स्थिरीकरण एलो जैल की खूबियों के कारण इसका कोमल और चिकना त्वचा के प्राकृतिक संतुलन को बनाने में सहायक होता है | अच्छे परिणाम पाने के लिए, आप इसका प्रयोग धुप में निकलने के 15-20 मिनट पहले करें |
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गर्मी में स्वास्थ्यरक्षक आहार-विहार ( एलोवेरा )


वैसे तो सभी ऋतुएँ अपने नाम व गुण के अनुसार कुछ न कुछ तकलीफ देती ही है लेकिन गर्मी की ऋतू सबसे ज्यादा कष्टप्रद है | घर से बाहर निकलो तो चिलचिलाती धुप से शरीर भट्टी की तरह तपने लगता है | घर के अन्दर न तो कूलर से रहत मिलती न ही पंखे से , थोड़ी देर हवा चल जाए तो पसीना अवश्य सुख जाता है | इस असहनीय तापमान को झेलना हमारी-आपकी मज़बूरी है , क्यूंकि जब सभी जगह लू-लपेट का बोलबाला हो तो ऐसे में किया ही क्या जा सकता है ?

आजकल पृथ्वी का तापमान भी पहले की अपेक्षा निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है ,क्यूंकि पर्यावरण का समीकरण दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहा है | बढ़ते जा रहे हवा के प्रदुषण से पृथिवी के चरों और उपस्थित 'ओजोन' परत में अब छेड़ हो गया है , जिससे सूर्य की किरने ज्यादा तेजी से पृथ्वी पर पड़ रही है , परिणामस्वरूप हम तरह-तरह के रोगों से घिरते जा रहे है |

वैसे हम सभी इस तरह के गर्मी के आदि बन चुके है
| हर समय इस गर्मी को कोसने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है, ऐसे में अपने आहार-विहार पर ध्यान से ही इस असहनीय भयंकर गर्मी से कुछ रहत प् सकते है | लेकिन इसकी अवहेलना करने से गर्मी के भयंकर दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते है | क्यूंकि गर्मी के कारण मनुष्य के शरीर का कफ दोष पिघलकर कम हो जाता है और वायु दोष में वृद्धि हो जाती है |

जैसे गर्मी के कारण इन दिनों जलाशय पेड़-पौधों का जलीयंग कम हो जाता है , वैसे ही मनुष्य के शरीर का गर्मी के कारण शरीर में जल की कमी हो जाने से जठराग्नि मंद हो जाती है |वैसे में भूख कम लगती है और खाया हुवा खाना ठीक से पचता नहीं है | प्यास लगने पर मुख-गला सूखने जैसे लक्षणों का आभास होने लगता है | इसी कारण इस मौसम में अजीर्ण, उलटी, दस्त,कमजोरी, बेचैनी अदि परेशानियाँ बढ़ जाती है |ऐसे में कम भोजन व ठंढा पानी ( मटके वाली) हितकर होता है |

गर्मी के दिनों में ज्यादातर आहार हल्का पेय पदार्थ हो और सुपाच्य भोजन में ही भलाई है | क्यूंकि भीषण गर्मी के कारण गरिष्ठ भोजन आसानी से हज्म नहीं होता जिससे तरह-तरह के उदार रोग घेर लेते है | लेकिन देखा गया है की अधिकतर लोग आहार के प्रति बहूत ही लापरवाह होते है, यह लापरवाही चाहे अनजाने में हो या जानबूझकर , रोगों के कारण तो बनते ही है |

गर्मी के दिनों में ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिकाधिक सेवन करना चाहिए जो, जो शीतल गुण वाले हो, बाहरी और शरीर की भीतरी गर्मी में राहत पाने के लिए सुबह सवेरे खाली पेट 50 ML एलोवेरा का जूस पीना चाहिए और अन्य पेय पदार्थ में मटके का पानी अधिक से अधिक पीना चाहिए | क्यूंकि गर्मी में शरीर से अधिक पसीना निकलने के कारण पानी की कमी हो जाती है , उसकी पूर्ति तरल पदार्थों से ही की जाती है | अतः पेय पदार्थ का सेवन इस ऋतू में विशेष लाभप्रद होता है |

इन दिनों में खाना भरपेट नहीं खाना चाहिए | अतः 'स्वल्पाहरी सजीवित' सिधांत के अनुसार भूख से थोडा कम खाना ही सेहत के लिए लाभप्रद है | गर्मी में मांस खाना और ठंढा भोजन करना वर्जित है , रात के भोजन में जौ या गेहूं की रोटी , हरी सब्जियां, प्याज , पुदीना या धनिया की चटनी का सेवन करना चाहिए | इस मौसम में कच्ची प्याज अवश्य खाना चाहिए |

सब्जियां में हरी सब्जी , बथुआ, टमाटर, करेला आदि के साथ नीबू का भी नियमित सेवन करना चाहिए | ऐसे मौसम में फलों की बहुलता रहती है जैसे खरबूजा, तरबूजा, आम, लीची फालसा आदि फल अधिक उपलब्ध होते है | इसका सेवन से अति लाभदायक होता है | और शरीर को निरोग रखने के लिए नित्य एलोवेरा जूस का सेवन करें |

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दही का सेवन स्वास्थ्यवर्धक


आज हमारे दिनचर्या में दही का विशेष महत्व है | प्रत्येक संस्कार यानि की गर्भ संस्कार से लेकर अंतिम संस्कार तक में हमारे यहाँ इसका उपयोग हो रहा है | यही उनकी पवित्रता और शुद्धता की पहचान है | जब कोई व्यक्ति अच्छे काम व व्यवसाय के लिए घर से निकलते है तो वे दही का सेवन जरुर करते है जिससे वे अपने काम में सफल हो सकेंगे, ऐसी मान्यता है | पर शायद आपको यह जानकर अत्यंत ख़ुशी होगी की दही का दैनिक आहार में सेवन करके मनुष्य अपने जीवन को और भी हष्ट-पुष्ट बना सकता है |

आजकल आग उगलती तेज गर्मी जहाँ नित्य नए कीर्तिमान बना रहे है | आलम यह है की छाया भी खुद छाया की तलाश कर रहा लगता है | ऐसे में अपने आपको कैसे स्वास्थ्य रख सके ? बहूत बड़ी चुनौती है | पर हम थोड़ी सी सावधानी और संयम रखकर इस तरह के गर्मी से बचा सकते है | अपने दैनिक खानपान में ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जी, जिसमे पानी ज्यादा होता हो , तेल मशाले व गरिष्ठ भोजन से बचे और दही जरूर अपने दैनिक आहार में रखें | जो लोग नियमित दही का सेवन करते है उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है जो उन्हें रोगों से सुरक्षा देती है |

दही का नियमित सेवन करने वाले व्यक्तियों में गामा इंटरफरान नमक प्रोटीन की मात्र अधिक पायी जाती है जो उनकी इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है | कई शोधों से यह भी पता चला है की दही का अधिक सेवन से कई प्रकार के प्रकार के कैंसर से भी सुरक्षा देता है विशेषतः बड़ी आंत के कोलोन कैंसर से | दही की सबसे बड़ी विशेषता यह है की इसमें लेक्टिक अम्ल की प्रचुर मात्रा होती है जिसके कारण बड़ी आंत में इस प्रकार का वातावरण बनता है, जो सड़ांध पैदा करने वाले जीवाणु यानि फुटरे फेकटिव वेक्टीरिया के विकास को रोकता है | इन जीवाणु को कोलोन बेसिल या बी कोली के नाम से भी जाना जाता है |

बुढ़ापे में तथा बढती उम्र के साथ-साथ शरीर विषैले पदार्थ बड़ी आंत के निचले भाग में सड़ांध जीवाणुओं की अत्यधिक सक्रियता के कारण पैदा होते है | स्वास्थ्य शरीर में सड़ांध जीवाणु, सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा नियंत्रित रहते है | जिनसे लेक्टिक अम्ल खमीर उत्पन्न करते है, जो बी कोली जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक है |

मतलब बड़ी आंत में जीवाणुओं का संतुलन बनाए रखने के लिए हमें दही का नित्य उपयोग करना चाहिए
| इसमें हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि रोकने की क्षमता होती है , जिसके कारण आंत में दुर्गंध कम उत्पन्न होती है | दही में कैल्सियम और लेक्टिक अम्ल की प्रचुर मात्रा होती है | रोजान दही सेवन करने से त्वचा की कोमलता बनी रहती है | साथ ही यह चिलचिलाती तेज धुप से भी , त्वचा की रक्षा करता है |

वैज्ञानिक शोधों से यह भी पता चला है की भोजन में कैल्सियम की मात्रा और कोलेरेक्टल कैंसर के बीच सम्बन्ध है | जिन व्यक्तियों के भोजन में कैल्सियम और दुग्ध उत्पादों की अधिक मात्रा होती है उनमे बड़ी आंत का कैंसर होने की आशंका कम होती है | दही का नियमित सेवन पाचन प्रणाली को स्वस्थ्य रखता है | औषधि विज्ञानं के अनुसार दही आंत्रशोथ, अतिसार, जठरांत्रशोथ, कब्ज़ अफारा और बच्चों की बीमारियाँ जैसे भूख नहीं लगना , पेट में गरबड़ी और दुर्बलता में भी लाभ पहुंचाता है |

दही ज़माने के ढंग के आधार पर भी इससे लाभ पाया जाता है | दूध को खूब उबालकर जो दही जमाया जाता है , वह भूख को बढ़ता है , किन्तु पितकारक होता है | बंगाल में दूध को ज़माने से पहले ही चीनी मिला दी जाती है जिसे मीठी दही कहते है | यह बेहद स्वादिष्ट और रक्त विकार को नाश करता है व प्यास को बढाता है |

दूध से मलाई निकलकर जो दही जमाया जाता है, वह मल बांधने वाला होता है और संग्रहणी रोग में खूब फायदा करता है | दही का सेवन पेट सम्बन्धी रोगों के लिए बहूत ही लाभदायक होता है | बकरी और उटनी के दूध का दही अत्यंत स्वास्थवर्धक होता है |

दही का सेवन खांसी,बुखार में और रात को नहीं करनी चाहिए | ठंढा और बरसात में दही का सेवन लाभ कम हानी ज्यादा कर सकता है | एलर्जिक,नजला,रक्तपित व श्वास सम्बंधित रोगी को दही खाने से परहेज करना चाहिए |दही के साथ चीनी के सेवन से दही की उपयोगिता कम हो जाती है |

अंततः हम यही कहना चाहेंगे की बुढ़ापे और बढती उम्र में कम से कम १७० ग्राम दही का सेवन आप रोजाना करें,क्यूंकि नियमित सेवन से शरीर के लड़ाकू बल्ड सेल्स की प्रक्रिया में तेजी आता है और एंटीबाडीज में वृद्धि होती है | एक शोध में यह भी पता चला है की दही उतना ही प्रभावशाली है जितना की मल्टीविटामिन दवा |


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तुलसी मानवजाति के लिए बहुपयोगी औषधि |

आयुर्वेद के समस्त औषधियों और जड़ी-बूटियों में तुलसी का अहम् भूमिका है | तुलसी से कोई अपरिचित नहीं है ,बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी जानते है | इसकी दो प्रजातियाँ होती है - सफ़ेद और काली | तुलसी में बहूत से गुण है | "राजबल्ल्भ ग्रन्थ" में कहा गया है ---- तुलसी पित्तकारक तथा वाट कृमि और दुर्गन्ध को मिटाने वाली है, पसली के दर्द खांसी, श्वांस, हिचकी में लाभकारी है | इसे सभी लोग बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति से पूजते है|

भारतीय चिकित्सा विधान में सबसे प्राचीन और मान्य ग्रन्थ "चरक संहिता" में तुलसी के गुणों का वर्णन एकत्रित दोषों को दूर करके सर का भारीपन, मस्तक शूल, पीनस, आधा सीसी, कृमि, मृगी, सूंघने की शक्ति नष्ट होने आदि को ठीक कर देता है | भारतीय धर्म गर्न्थों में तुलसी के रोग निवारक क्षमता की भूरी-भूरी प्रशंसा की गयी है ----

तुलसी कानन चैव गृहे यास्यावतिष्ठ्ते |
तदगृहं तीर्थभूतं हि नायान्ति ममकिंकरा ||
तुलसी विपिनस्यापी समन्तात पावनं स्थलम |
क्रोशमात्रं भवत्येव गांगेयेनेक चांभसा ||

तुलसी से मृत्युबाधा दूर होती है | उसकी गंध का प्रभाव एक कोस तक होता है | जब इससे रोगों की निवृत हो जाती है ,तब यम की बाधा तो हटती ही है, क्यूंकि रोग ही तो यम के दूत बन कर आते है | वैज्ञानिकों द्वारा यह प्रमाणित हो चूका है की तुलसी के संसर्ग से वायु सुवासित व शुद्ध रहती है |


पौराणिक कथाओं में तुलसी को प्रभु का भक्त बताया गया है | भगवन के आशीर्वाद से ही तुलसी ( पौधे के रूप में ) घर-घर में विराजमान रहने लगी |मंदिर में भगवान् का चरणामृत देते समय पुजारी तुलसी पात्र के साथ गंगाजल देते है और प्रसाद के सभी पदार्थों में तुलसी पत्र डाला जाता है |

क्युकी यह 'अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम' अर्थात यह अकाल मृत्यु से बचाती है और सभी रोगों को नष्ट करती है | मृत्यु के समय तुलसी मिश्रित गंगाजल पिलाया जाता है जिससे आत्मा पवित्र होकर सुख-शांति से परलोक को प्राप्त हो | इसीलिए लोग श्रधापुर्वक तुलसी की अर्चना करते है, सम्मान इसका ऐसा होता है की कार्तिक मास में तो तुलसी की आरती एवं परिकर्मा के साथ-साथ उसका विवाह किया जाता है |

अनुसंधान कर्ताओं ने पाया है की पेट-दर्द, और उदार रोग से पीड़ित होने पर तुलसी के पत्तों का रस और अदरक का रश संभाग मिलकर गर्म करके सेवन करने पर रोग का प्रभाव हट जाता है | तुलसी के साथ में शक्कर अथवा शहद मिलकर खाने से चक्कर आना बंद हो जाता है | सिरदर्द में तुलसी के सूखे पत्तों का चूर्ण कपडे में छानकर सूंघने से फायदा होता है |

वन तुलसी का फुल और काली मिर्च को जलते कोयले पर दल कर उसका धुना सूंघने से सिर का कठिन दर्द ठीक होते देखा गया है | केवल तुलसी पत्र को पिस कर लेप करने, छाया में सुखाई गयी पत्तियां के चूर्ण को शुन्घने से सिर दर्द में काफी आराम पहुँचता है |
छोटे बच्चे को अफरा अथवा पेट फूलने की शिकायत प्रायः देखि गयी है, जिसमे तुलसी और पान पत्र का रस बराबर मात्रा में मिलाकर इसकी दस-दस बूंद सुबह दोपहर शाम बराबर देते रहने से काफी आराम मिलता है | दांत निकलते समय बच्चों को जोर से दस्त लग जाते है इसमें भी तुलसी पत्ते का चूर्ण शहद में मिलाकर से लाभदायक होता है | बच्चों को सर्दी और खांसी की शिकायत होने पर तुलसी पत्र का रस उपयोगी सिद्ध होता है |

तुलसी के आसपास का वायुमंडल शुद्ध रहने के कारण प्रदुषण अन्य रोगों का पनपने का मौका नहीं मिलता है | पेय जल में यदि तुलसी के पत्तों को डालकर ही सेवन किया जाए तो कई तरह के रोगों से बचा जा सकता है |
तुलसी को संस्कृत भाषा में 'ग्राम्य व सुलभा इसलिए कहा गया है की यह सभी गांवों में सुगमता -पूर्वक उगाई जा sakti है और सर्वत्र सुलभ है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आरोग्य प्राप्त करने की दृष्टि से इसका आरोपण सभी घरो में होना चाहिए |
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एलोवेरा ( हर्बल औषधियां ) सौन्दर्यशक्ति व तनावमुक्ति के लिए


घरेलु नुस्खों से निकलकर भू-मंडलीय पर अंकित आयुर्वेद आज विश्वसनीयता के मानचित्र पर सबसे ऊपर दिखाई देने लगा है | वर्षों का सफ़र इस बात का संकेत है की इस आयुर्वेद में निश्चित ही विशिष्ट गुण निहित है जिसके कारण आयुर्वेद प्राचीन काल से अबतक इस धरा पर अपनी पहचान बना कर रखा है | आयुर्वेद का अस्तित्व का होना इस बात को भी इंगित करता है की ऋषि-मुनियों द्वारा देवों की चिकित्सा आयुर्वेद के माध्यम से होती थी और इसी परिपाटी को जीवित करते हुए आयुर्वेद आज मानव सेवा कर रहा है | प्राचीन काल से हमारे घरेलु उपचार की विधियाँ यहाँ के परिवार में रची-बसी रही है |

आयुर्वेद में बढती हुई रूचि का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है की आज की युवा वर्ग आयुर्वेद को बदलती शैली के साथ चाहने लगी है | एलोवेरा को आयुर्वेद की खास पहचान जानने लगी है | इतना ही नहीं, युवा पीढ़ी अब खुद को स्वास्थ्य रखने के लिए सामान्य आहार के अलावा अपने भोजन में आंवला, च्यवनप्राश, एलोवेरा का रस भी शामिल करने लगे है |

सर्दी-जुकाम जैसे छोटे समस्या के लिए वे आयुर्वेद के नुस्खे व दवाइयों पर ज्यादा भरोसा करने लगे है | भागमभाग और तेज रफ़्तार जिन्दगी के इस दौर में मनुष्य मशीन की तरह काम कर रहा है और मुफ्त में साथ में तनाव पाल रहा है | ऐसे में आयुर्वेदिक औषधियां थकान व तनाव मिटाने में अत्यंत लाभकारी साबित हो रही है |

हर्बल औषधियां ( एलोवेरा जेल) मुख्य रूप में सौन्दर्यशक्ति व तनावमुक्ति में लोगों की पहली पसंद बनती जा रही है | प्रकृति का वास्तव में अनुपम व उत्कृष्ट उत्पाद है एलोवेरा | एलोवेरा की लोकप्रियता का आलम यह है की आज युवाओं में बतौर फैशन यही आयुर्वेद का विकल्प हो गया है |

महगाई की इस दौर में भी ४३ प्रतिशत लोग यह स्वीकार करते है की अपेक्षाकृत सस्ती व सुरक्षित है | मोटापा व बढ़ते वजन तथा असाध्य रोग भी आयुर्वेद ( एलोवेरा ) चिकित्सा से ठीक हो रहे है |७२ प्रतिशत लोगों की यह मानना है की पहले बुजुर्ग लोग ही आयुर्वेद पर भरोसा करते थे पर अब युवाओं में जागरूकता आई है , इससे लगता है की आने वाला कल में एलोवेरा और इससे सलग्न पौष्टिक पूरक की चाहत बढ़ेगी , क्युकी आयुर्वेद ( एलोवेरा ) चिकित्सा के अलावा भी शरीर के सर्वांगीन विकाश का काम करता है |

आयुर्वेद को लेकर लोगों में जागरूकता आई है ,लोग यह समझने लगे है की आयुर्वेद ही एक मात्र रास्ता है जहाँ मनुष्य की कायाकल्प संभव है | लोग यह भी जान गए है की एलोवेरा और उनके पौष्टिक पूरक के माध्यम से असाध्य रोगों पर विजयी प्राप्त कर सकते है | कुल मिलाकर जीवन के कसौटी पर आयुर्वेद अब खरा उतरने लगा है |

इसमें अच्छा व्यवसाय भी नजर आने लगा है | आज एलोवेरा ( आयुर्वेद ) की उत्पाद को लेकर हमारी कम्पनी भी करीब अपने देश में विगत १० साल से व्यवसाय कर रही है और करीब ८५ प्रोडक्ट इस समय सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए बाजार में उतरा हुआ है | शरीर से सम्बंधित करीब २२० प्रकार के रोग में आप हमारी कंपनी के उत्पाद की सहायता ले सकते है और अपना जीवन पुर्णतः खुशहाल बना सकते है |

फॉरएवर लिविंग प्रोडक्ट जो एलोवेरा के सर्वश्रेष्ठ उत्पादक है | दुनिया में ८५ प्रतिशत बाजार पर इनका अकेले का कब्ज़ा है और ३२ साल से १४२ देश में यह अपना व्यवसाय कर रही है | कम्पनी की पहचान उनका उत्कृष्ट व स्थिरीकरण प्रक्रिया से तैयार किया गया एलोवेरा जेल है | १३००० करोड़ की कंपनी का ५० प्रतिशत विक्री सिर्फ एलोवेरा जेल का है |

शरीर के किसी भी प्रकार के रोग में यह एलोवेरा जेल कारगर साबित होता है |


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एलोवेरा (Aloevera) कुदरत की दिव्य औषधि |



आज फिर से इच्छा जागृत हुई की क्यूँ नहीं सर्वप्रिय विषय एलोवेरा के सन्दर्भ में कुछ लिखा जाये | इसके विषय में जितनी बार चर्चा की जाए कम लगता है |
विगत कुछ साल से जिस तरह से एलोवेरा ने अपनी पहचान बनाई है वह कविले तारीफ है | हमें लोगों से एलोवेरा के बारे में ज्यादा बताने की जरुरत नहीं पड़ता |
चुकी लोग इसके गुण के बारे में पहले से परिचित होते है |

लोग इसे अलग-अलग शहर में इसे अलग-अलग नाम से जानते है | पर इतना जरुर जानते है की एलोवेरा इस धरती पर मनुष्य के लिए कुदरत का नायाब तोहफा है | कहीं इसे ग्वारपाठा ,घृतकुमारी,घी ग्वार, कुमारी तथा वनस्पति विज्ञानं में इसे Aloe Vera कहते है | यह गाँव में खेतों के आसपास नगरों में सड़कों के किनारे और पार्कों में बखूबी देखे जाते है लोग घर के गमले में भी लगाते है |


यह मनुष्य जाति के लिए सौभाग्य की बात है की प्रकृति ने उसे आज के प्रदूषित वातावरण में अमृत सामान अनमोल सौगात दी है | यदि मनुष्य इस अनमोल रत्न की कद्र करें,इनका सदुपयोग करें तो वह अपने जीवन को स्वस्थ्य ,सुखी और खुशहाल बना सकता है | लेकिन ऐसा तब संभव हो सकता है जब इस एलोवेरा जेल के गुण कर्म और प्रभाव के बारे में जानकारी रखता हों |

कुदरत ने एलोवेरा के अंदर गुणों का सम्पूर्ण भंडार छुपा रखा है | शरीर के लिए जितने भी जरुरी तत्व चाहिए जिससे की दिनचर्या का काम स्फूर्ति से कर सकें , सब के सब एलोवेरा में है | इसलिए इसे हम सम्पूर्ण आहार भी कहते है | पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण एलोवेरा शरीर को स्वस्थ्य एवं निरोग रखने में सक्षम है |

आयुर्वेद के आचार्यों ने मनुष्य के सौन्दर्य के लिए अनेकानेक बातें बताई है | इसमें स्वस्थ्य को सौन्दर्य का आधार बताया है | स्वास्थ्य के विषय में भी शरीर मानस स्वास्थ्य की बात कही है | यानि जब शरीर और मन का सौन्दर्य नहीं रखा जा सकेगा तो समग्र सौन्दर्य की परिकल्पना बैमानी साबित होगी | आयुर्वेद से ही प्राकृतिक तरीके से अपने सौन्दर्य को संरक्षित रख सकते है |

त्वचा और शरीर के अन्दुरुनी सौन्दर्य के लिए एलोवेरा आज का सबसे बेहतरीन और भरोसेमंद उत्पाद हो सकता है | अगर आप उच्च गुणवता वाली एलोवेरा का उत्पाद बाजार से खरीदते है तो आपको मनवांछित लाभ मिल सकेगा | मतलब उस कारण का निदान संभवतः हो जाएगा |
आज बाजार में संशलेषित और रासायनिक पदार्थों से बना कोस्मेटिक उत्पाद रोज के जीवन में हम अपनाते है | नहाने के साबुन से लेकर तेल,डियोड्रेंट ,क्रीम,हेयर डाई, सेंट्स तक हर जगह हम कोस्मेटिक का प्रयोग करते है | ये त्वच पर पर्याप्त दुष्प्रभाव डालते है इस कारण हर्बल कोस्मेटिक का बाजार अरबों रुपैये का हो गया है |

आखिर हो भी क्यूँ नहीं? आज सबको अच्छी तरह से समझ आ चूका है की संशलेषित सौन्दर्य प्रसाधनों से त्वचा के साथ पुरे शरीर का किस तरह से और कितना नुकसान होता है | रूप निखारने में प्रयुक्त पदार्थ कितने जानलेवा साबित होते है | अतः हमें विश्व स्तरीय एलो उत्पाद जो त्वचा के संरक्षण के साथ-साथ सम्पूर्ण स्वास्थ्य की भी रक्षा होती है | दूसरी बड़ी बात यह भी है की एलोवेरा युक्त क्रीम या जेल में संशलेषित कोस्मेटिक क्रीम के कारण उत्पन्न दुष्प्रभावों को भी दूर करने की विशेषता होती है |

यही कारण है की आज एलोवेरा युक्त सौन्दर्य प्रसाधनो की विश्व बाजार में भारी मांग है और ऐसे हर पदार्थ में आज एलोवेरा का नाम जुड़ता जा रहा है | अच्चे, विश्वसनीय और ब्रांडेड एलोवेरा उतपाद ही आपके तन व मन को सौन्दर्य प्रदान कर सकती है |

अन्यथा सुन्दर दीखने का यह उपक्रम कहीं जीवन का नाश करने का माध्यम नहीं बन जाये |


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हरी सब्जियां आपके बेहतर स्वास्थ्य के लिए |

शरीर की उचित वृद्धि और विकास के लिए कम से कम १० खनिजों की जरुरत होती है | इनमे से mxvegकैल्सियम और फ़ोस्फ़ौरस तत्वों की आवश्यकता काफी अधिक पड़ती है और सब्जियों को छोड़कर किसी भी खाद्य पदार्थ में इनकी प्रयाप्त मात्रा नहीं पाई जाती है | इनमे औषधीय गुण भी होते है | संतुलित आहार, पाचन क्रिया की दुरुस्ती तथा स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सब्जियां अति आवश्यक होती है |


inf (73)भारत जैसे देश में जहाँ अधिकांस लोग शाकाहारी होते है ,सब्जियों का महत्व और अधिक है फिर भी हमारे यहाँ और देशों के अपेक्षा सब्जी का उपयोग बहूत ही कम होता है | एक आहार विशेषज्ञों के अनुसार , एक व्यक्ति को प्रतिदिन संतुलित आहार के लिए ३६० ग्राम सब्जी,जिसमे ११५ ग्राम पतेवाली हरी सब्जी,११५ ग्राम अन्य सब्जी तथा ६० ग्राम जड़ वाली हो, प्रयोग करनी चाहिए |

यह भी प्रमाणित हो चूका है की जिन सब्जियों को सीधे सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है, उनसे हमें शक्ति प्राप्त होता है ,हरी साग-सब्जियों में सूर्य की किरणे निहित रहती है ,परिणामस्वरूप यह हरेपन में विद्यमान रहने से हमारे पेट में जाकर विषाक्त रोगाणुओं का नाश करती है ,रोगमुक्त करती है,और हमें निरोग रखती है | हरी सब्जियों को पचाने के लिए शरीर के विशेष उर्या की खपत भी नहीं होती है जिसे दुर्बल से दुर्बल व्यक्ति भीआसानी से पचा सकता है |

विटामिन्स से युक्त हरी सब्जियां -------------- सब्जियों में लगभग सभी विटामिन्स पाए जाते है | विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी ,पथरी, मुहांसे, त्वचा विकार आदि उत्पन्न हो जाते है | हरी सब्जियों में विटामिन ए की मात्रा अधिक या कम होना सब्जी की किस्म और उगाने के मौसम पर निर्भर करता है | और्सतन १२० ग्राम हरी सब्जी में विटामिन ए की २००० से १२००० तक अंतर्राष्ट्रीय इकाइयां पाई जाती है जो किसी भी व्यक्ति की दैनिक आवश्यकता के लिए प्रयाप्त है |


विटामिन ‘बी’ --------- इसे थायमिन भी कहा जाता है | इनकी कमी से बेरी-बेरी रोग,भूख में कमी तथा शरीर के तापमान में गिरावट आदि विकार उत्पन्न हो जाते है | शरीर की वृद्धि एवम जनन के लिए यह जरुरी है, हरी पतियाँ विटामिन बी की धनि होती है ,सलाद, हरी मिर्च, गाजर, प्याज जैसी सब्जियों में विटामिन बी का वितरण अनियमित होता है तथा सेम व मटर में पतियों की अपेक्षा बीजों में इसकी अधिक मात्रा पाई जाती है |

विटामिन ‘सी’ ---- ----- यह एक विलेय विटामिन है तथा इसकी कमी से गठिया, स्कर्वी रोग ,दांत व मसूढ़ों का कमजोर होना आदि विकार उत्पन्न होते है, मेथी, पलक, सलाद,हरीमिर्च तथा अन्य हरी सब्जियों में विटामिन सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है |


विटामिन ‘डी’ ‘इ’ ‘जी’ ------------- यह भी हरी सब्जियों में प्रयाप्त मात्र में पाई जाती है | सब्जियों के रेशेदार भाग पाचन क्रिया में सहायक होते है तथा कब्ज़ को रोकते है | अधिकांश सब्जियों, विशेषकर पतेवाली जैसे -- पालक, सलाद तथा विभिन्न सागों में जल तथा सेलुलोज या रेशे अधिक होते है | इनका और अधिकांश जड़दार सब्जिओं का उपयोग पेशियों, विशेष रूप से आँतों की पेशियों के सुचारू ढंग से कार्य करने में सहायक होता है |

सामान्य रोगों को दूर करने में सहायक ---------
सब्जियों के उपयोग से सामान्य रोग दूर किये जा सकते है , जब कभी भी चर्म रोग, रतौंधी तथा बच्चों में वृद्धि रुकने की शिकायत हो तो शकरकंद , पालक,शलजम की पतियाँ, गाजर, टमाटर तथा हरी मटर आहार में शामिल कर लेनी चाहिए |

जब परिवार में भूख न लगती हो, कब्ज़ हो, स्फूर्ति की कमी, अंत व तंत्रिका तंत्र में विकार आदि की शिकायत हो तो दैनिक आहार में पालक,शलजम की पतियाँ ,सेम तथा सलाद की प्रचुर मात्रा लेनी चाहिए |


मशुढ़े, दंत विकार आदि होने पर टमाटर, पालक, फूलगोभी, आलू, मटर, खीरा-ककड़ी, प्याज, सलाद जैसी ताजी सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए , बच्चों में हड्डियों का सही विकास न हो रहा हो, उनके दांत कमजोर हों तथा वे शुखा रोग से पीड़ित हों तो उनके भोजन में आलू, सेम तथा पालक की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए |


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एलो वेरा आँखों की जवानी के लिए |


खुबसूरत आँखों के बारे में तारीफ सुनना किसे नहीं अच्छा लगता है | अगर कोई आपके आँखों के बारे में कहे -------- तेरे आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ? तन और मन दोनों प्रसन्नचित हो उठता है |

आँख शरीर का ऐसा अंग है जिसे प्रकृति ने उसकी रचना द्वारा स्वयं उसे संरक्षण प्रदान किया है | आँख शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है जिसके बिना दुनिया का सारे सुख और सौन्दर्य अर्थहीन लगता है | यह प्रकृति का सर्वोत्तम व खुबसूरत तोहफा है | नेत्र है तो हम दुनिया के आसपास की रंगीनी को देख पाते है वर्ना चरों और अँधेरा ही अँधेरा |

आँखों को एक हड्डी के खंड में रखा गया है ताकि वह बहरी धुंए, धुल, प्रदुषण, दुर्घटनाओं, आदि से सुरक्षित रहे | इसके सुरक्षा के लिए कुछ उपयोगी बाते पर ध्यान देना अतिअवाश्यक है | क्यूंकि आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव आँखों पर पड़ता है | अत्यधिक श्रम, चिंता, और तनाव से आँखे विकारग्रस्त हो जाती है | नींद की कमी, थकान, अधिक काम लेना, फिल्म या टीवी को बहूत पास से देखना , तेज प्रकाश या हवा में आँखे खुली रखना ,आँखों की सफाई पर ध्यान नहीं देना आदि कारणों से आँखें व्याधियों कीशिकार हो जाते है |

आँखों की देखभाल व रखरखाव रखरखाव के लिए जरुरी है आपके भोजन में पोष्टिक तत्व की मौजूदगी ,नियमित रूप से आँखों की जांच करनी चाहिए |

प्रत्येक व्यक्ति को 40 साल की उम्र के उपरांत मधुमेह की जांच अवश्य करना चाहिए ,क्यूंकि मधुमेह के प्रभाव से शरीर के अन्य अंगों के साथ आँखों को भी दुष्प्रभावित कर सकता है | आँखों की पोष्टिकता प्रदान करने हेतु विटामिन ए युक्त आहार जैसे हरी पतीदार सब्जियां, पालक, टमाटर, गाजर,कद्दू, पपीता, आंवला, आम आदि का सेवन करना अति आवश्यक है |

आज कल गर्मी का आलम यह है की १० बजे के बाद ही घर से निकलना मुश्किल लगता है | आँखों में तेज जलन सा महसूस होता है | इस मौसम के तेज गर्मियों में तवचा के साथ -साथ आँखों पर भी बहूत गहरा प्रभाव डालता है | यही वो मौसम है जब आग उगलता सूरज अपनी तपन से तन जो झुलसाने में कोई कसार बाकि नहीं छोड़ता, ऐसे में आँखों की सुरक्षा बेहद जरुरी है गर्मियों के मौसम में हम अपनी त्वचा को तो ध्यान रखते है लेकिन आँखों को भूल जाते है | ऐसे मौसम में आँखों में वायरल संक्रमण होने के खतरा ज्यादा रहता है | बैक्टेरिया , वायरस और दूसरी एलार्गी गर्मी में पनपती है जो आँखों को अपना शिकार बना सकती है |
अगर ऐसा महसूर हो तो फ़ौरन डॉक्टर की सलाह लें |

संक्रमण से बचने के उपाय :-

हाथों को हमेशा साफ़ रखें | धुप चश्मे आपको सिर्फ धुप से नहीं ,बल्कि धुंएँ और गंदगी से होने वाली एलर्जी से भी बचाते है |
कोन्टक्ट लेंस को अच्छे से साफ़ करके उपयोग करें |
गर्मी के कारण आंखे लाल होने पर ठंढे पानी से आँख साफ करके थोड़ी देर के लिए आँखे बंद करके बैठे |
सुबह सूर्योदय से पहले उठे और उठते ही मुह में पानी भरकर बंद आँखों अपर २०-२५ बार ठंढे पानी के छीटे मारे | याद रखे, मुह पर छीटे मरते समय या चेहरे को पानी से धोते समय मुह में पानी भरा हो |
धुप , गर्मी\या श्रम के प्रभाव से शरीर गर्म हो तो चेहरे पर ठंढा पानी न डाले |
थोडा विश्राम पर पसीना सुखाकर और शरीर का तापमान सामान्य करके ही चेहरा धोएं |
आँखों को गर्म पानी से न धोएं | देर रात तक जागना और सूर्योदय के बाद देर तक सोना आँखों के लिए हानिकारक होता है | देर रत तक जागना ही पड़े तो घंटे-आधे घंटे में एक गिलास पानी पी लेना चाहिए |

हमारे पास इससे बचने के लिए विश्व प्रसिद्ध पौष्टिक पूरक है जिसके उपयोग से आँखों का पोषण होगा | इस लिए अपने आहार में इस पौष्टिक पूरक का समावेश करें | जिनमे नेत्र शक्ति बने रखने के लिए आवश्यक विटामिन ए प्रयाप्त मात्र में उपलब्ध रहता है | आप इस तरह से अपने आँखों की समस्या से निजात पा सकते है |

पौष्टिक पूरक जो आँखों के लिए अति आवश्यक है जिसका विवरण निचे दिया जा रहा है :--
१. एलो बीट'स न पिचेज विटामिन ए से भरपूर है जो आँखों के पोषक के लिए जरुरी है
२. फोरेवर विजन इसमें मौजूद गुण आपके आँखों को सदा जवान बने रखेगा |
३. एलो एक्टिवेटर इससे आँखों में दो बूंद डालकर प्रदूषित दृष्टिपटल को सुरक्षित रख सकते है
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स्वास्थ्यवर्धक पूरक उच्च गुणवता का प्रयोग करें |


आजकल लोग मल्टीविटामिन्स की गोलियां बाजार से बिना कुछ सोचे समझे अपने सेहत को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए उपयोग कर रहे है | पर अगर आप यह सोचकर मल्टीविटामिन्स गोलियां ले रहे है की इनसे कोई आपका फायदा होगा तो आप कुछ और नहीं बल्कि अपने बक्त के साथ-साथ पैसे व सेहत दोनों का नुकसान कर रहे है |

एक प्रसिद्ध न्यूट्रीसन के मुताबिक , हर साल 4838 करोड़ रूपये उगाही करने वाली ऐसी कम्पनी लोगों के पैसे लुट रही है |मसलन कुछ मामले में तो यह लेना खतरनाक भी हो सकता है |अगर जो लोग मछली का तेल लेने के आलावा मल्टीविटामिन्स भी ले रहे है तो आने वाला समय में उनकी हड्डियाँ कमजोर पर सकती है क्यूंकि वो जरुरत से ज्यादा विटामिन-ए ले रहे है |

स्वास्थ्य को लेकर आप चाहे कितने भी जागरूक क्यूँ न हो पर ऐसी सप्लीमेंट दवाइयां बिना किसी डॉक्टर या मेडिकल एक्सपर्ट के राय से नहीं लेनी चाहिए | कई लोग ऐसी दवाइयां सिर्फ इस लिए ले लेते है की वे अपनी सेहत को लेकर बेहद चिंतित और सावधान रहते है | वे इन्हें लेने से पहले यह नहीं सोचते की वे क्यूँ ले रहे है ,कितनी मात्रा में लेनी चाहिए या लेनी भी चाहिए या नहीं |

औसतन हमारे आहार से ही प्रयाप्त विटामिन -सी मिल जाती है और अगर इसे बढ़ाना ही तो थोडा और स्वास्थ्यप्रद खाना खाया जाए | हालाँकि कुछ खास अवस्थाओं में कुछ पौष्टिक पूरक फायदा कर सकते है | मसलन, ऐसे बुजुर्ग जिनमे विटामिन- डी कम है ,गर्भवती महिला जिन्हें फोलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है | लेकिन उद्योग का समर्थन करने वाली हेल्थ सप्लीमेंट इनफोर्मेसन सर्विस का कहना है की अपने आहार में धीरे-धीरे सुधर कर रहे लोगों में विटामिन और मिनरल्स की मात्रा बढाने में सप्लीमेंट फायदेमंद है |


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कैल्सियम और आयरन का भंडार है बथुआ भाग-२


सर्दी के मौसम में आसानी से उपलब्ध बथुए के साग को भोजन में अवश्य सम्मिलित करना चाहिए ,बथुए के पतों का साग पराठे,रायता बनाकर या साधारण रूप में प्रयोग किया जाता है |
कब्ज़ में बथुआ अत्यंत गुणकारी है,अतः जो कब्ज़ से अक्सर परेशां रहते है
उन्हें बथुए के साग का सेवन अवश्य करना चाहिए |
पेट में वायु हो गोला और इससे उत्पन्न सिरदर्द में भी यह आरामदायक है, आँखों में लाली हो या सुजन बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है |इसके अलावा चरम रोग ,यकृत विकार में भी बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है |


बथुआ रक्त को शुद्ध कर उसमे वृद्धि करता है | बुखार और उष्णता में इसका उपयोग बहूत ही कारगर होता है | यह आयरन और कैल्सियम का अजस्त्र भंडार है | औरतों को आयरनो तथ रक्त बढाने वाले खाद्यपदार्थ की ज्यादा जरूरत होती है | अतः उन्हें इसके साग का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए |

खनिज लवणों की प्रचुरता से यह हरा साग-सब्जियां ,शरीर की जीवन शक्ति को बढाने खास लाभकारी होता है | इसकी पतियों का रस ठंढी तसिरयुक्त होने के कारण बुखार, फेफड़ों एवं आँतों की सुजन में फायदेमंद है |

बथुए के रस बच्चों को पिलाने से उनका मानसिक विकाश होता है, बथुए का १०० ग्राम रस निकल कर पीने से पेट के कीड़े मर जाते है | रस में थोडा-नमक मिलाकार पीने से पेट के कीड़े मर जाते है | रस में थोडा सा नमक मिलाकर इससे ७ दिनतक सेवन करना चाहिये | ५० ग्राम बथुए को एक ग्लास पानी में उबल-मसल कर छान कर पीने में स्त्रियों के मानसिक धर्म के गर बड़ी दूर होती है |

"( पथरी के रोगीओं को बथुए के साग का सेवन नहीं करना चाहिये ,क्युकी इसमें लौह तत्व अधिक होने के कारन पथरी का निर्माण होता है | "

बथुए के औषधीय महता :-----------
बथुए के सेवन अनेक प्रकार के रोगों के निवारण के लिए भी इसका प्रयोग घरेलु औषधि के रूप में भी किया जाता है :- जैसे
१. रक्ताल्पता :-- शरीर में रक्त की कमी पर बथुए का साग कुछ दिनों तक करने अथवा इसे आटे के साथ गुन्धकर रोटी बनाकर खाने से रक्त की वृद्धि होती है |
2.त्वचा रोग :--- रक्त को दूषित हो जाने से त्वचा पर चकते हो जाते है ,फोड़े,फुंसी निकल आती है | ऐसे में बथुए के साग के रक्त में मुल्तानी का लेप बनाकर लगाने से आराम मिलता है | साथ में बथुए का साग बनाकर या रस के रूप में सेवन करना चाहिये | इससे रक्त की शुद्धि होती है और त्वचा रोगों से छुटकारा मिलता है |
3.फोड़ा :- बथुए की पतियों को सोंठ व नमक के साथ पीसकर फोड़े पर बांधने से फोड़ा पककर फुट जाएगा या बैठ जायेगा |
४. पीलिया :- कुछ दिनों तक बथुए का साग खाने या सूप बनाकर पीने से पीलिया ठीक हो जाता है |
५. पीड़ारहित प्रसव :- बथुआ के १० ग्राम बीजों को कूटकर ५०० मिलीलीटर पानी में मिलाकर उबाले, जब आधा पानी रह जाए तो उतारकर छानकर पियें ,डेलिवरी से २० दिन के पहले से इसका प्रयोग करना चाहिए | इसमें बच्चा बिना ओपेरेसन के पैदा हो रहे है और प्रसव पीड़ा भी कम हो जाती है |
6.उदार कृमी : - इसके सेवन से पेट के कृमी स्वत मर जाती है |
7.जुआं और लीख :- बथुए की पतियों को उबालकर उस उबले हुए पानी से सिर धोने से सिर के सारे जुएँ ख़त्म हो जाते है |
8.अनियमित मासिक धर्म :- ५० ग्राम बथुआ की एक ग्लास पानी में उबाल-छानकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से तथा उसकी सब्जी बनाकर खाने से | बथुआ की सब्जी हमेसा कुकड में बिना मिर्च मसाला के बनाकर खाना चाहिये |

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कैल्सियम और आयरन का भंडार है बथुआ |

आज चर्चा करने जा रहा हूँ जो ( गाँव की शान है ,सेहत की जान है,) आम लोगों को आसानी से आहार में मिलता रहा है | इसकी गणना हरी पतेदार सब्जी में की जाती है | जो लौह तत्व और कल्स्शियम से भरपूर है | हमारे पूर्वजों की सबसे पसंदीदा शाक ( साग ) है जिसका नाम है बथुआ | बथुआ में प्रायः शरीर के सभी पोषक तत्व पाए जाते है | मौसम के अनुसार उपलब्ध इसका सेवन करके छोटे-छोटे रोगों से अपना बचाव स्वयं किया जा सकता है | वैज्ञानिक शोधों से पता चल चूका है कि जिन सब्जियों को शीधे सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है,वे पेट में जाकर विषाणु-कीटाणुओं का नाश करती है | बथुआ भी उन्ही सब्जी में से एक है जिन्हें सूर्य का प्रकाश सीधे मिलता है |

विभिन्न प्रकार के पौष्टिक तत्वों से सुसज्जित बथुआ एक सस्ता साग है | विशेषकर यह ग्रामीण क्षेत्र में सहजता से प्राप्त होने वाला प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है | ग्रामीण इलाकों में बथुआ कि कोई उपियोगित नहीं है,जबकि प्रक्रति ने इसमें सभी प्रकार के अच्छाइयाँ समाहित कर रखी है | भोजन में इसकी मौजदगी से कई प्रकार के रोगों से बच सकते है | यह बाजारों में दिसंबर से मार्च तक आसानी से मिल जाता है |

बथुआ अपने आप गेहूं व जौ के खेतों में उग जाता है | इसके पते त्रिकोनाकर व नुकीले होते है , इसके पौधे पर सफ़ेद,हरे व कुछ लालिमा लिए छोटे-छोटे फुल होते है | बीज काले रंगे के सरसों से भी महीन होते है | पकने पर बीज खेत में गिर जाता है और साल भर तक जमीन के अन्दर पड़े होने के बाद अनुकूल जलवायु व परिस्थितियां मिलने पर स्वतः उग आते है |

बथुआ के बारे में प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थ में भी उल्लेख मिलता है | आयुर्वेद में इसकी दो प्रजातियाँ है ,एक गौड़ बथुआ जिसके पते कुछ बड़े आकर तथा लालिमा लिए होते है ,जो अक्सर सरसों ,गेहूं आदि के खेत में प्राप्त होता है | दूसरा है,यवशाक जिसके पतों पर लालिमा नहीं होती, पते भी पहले जाती के अपेक्षा कुछ छोटे होते है,जो अक्सर जौ के खेतों में अधिकतर मिलता है इसीलिए इसे यवशाक कहते है |

बथुआ को संस्कृत में वस्तुक,क्षारपत्र ( पतों में खरापर के वजह से ) शाकराट ( सागों का राजा ) ,हिंदी में बथुआ ,पंजाबी में बाथू, बंगाली में बेतुवा, गुजराती में वाथुओ,
महारास्त्र में चाकवत, और अंग्रेजी में ह्वाईट गुज फुट ( White goose foot ) कहते है ,इसका लैटिन नाम चिनोपोडियम अल्बम ( Chenopodium album ) है |


बथुआ में 70% जल होता है , इसके अन्दर पारा, लौह, क्षार, कैरोटिन व विटामिन C आदि खनिज तत्व पाए जाते है | भाव प्रकाश में इसके गुणों का उल्लेख में लिखा है कि बथुआ क्षारयुक्त, स्वादिष्ट, अग्नि को तेज करने वाला तथा पाचनशक्ति को बढ़ानेवाला है |

दीपनं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदनम |
सरं प्लीहास्त्रपितार्शः कृमिदोषत्रयापहम ||

बथुआ का शाक पचने में हल्का ,रूचि उत्पन्न करने वाला, शुक्र तथा पुरुषत्व को बढ़ने वाला है | यह तीनों दोषों को शांत करके उनसे उत्पन्न विकारों का शमन करता है | विशेषकर प्लीहा का विकार, रक्तपित, बवासीर तथा कृमियों पर अधिक प्रभावकारी है |

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बच्चों के आहार में ओमेगा-३ की अहमियत और डिस्लेक्सिया ( Dyslexia )


आज मैं आपके सामने बच्चों के स्वास्थ्य से सम्बंधित बीमारियाँ के बारे में चर्चा करेंगे | विगत वर्ष एक बहूत ही अच्छी ,साफ-सुथरी फ़िल्म बच्चों पे आधारित था |
जो बच्चों के अन्दर छुपा हुआ गुण और अबगुण के बारे में खूबसूरती से चित्रित किया था |
जिसके अन्दर आमिर खान साहेब जिस बीमारी के बारे में चर्चा कर रहा था वो था डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) |

डिस्लेक्सिया वह तंत्रिका गरबड़ी है जो बच्चों को होती है | ऐसे बच्चे अक्सर अक्षर और शब्दों को पहचानने में भ्रमित हो जाता है | उन्हें लिखा हुआ अक्षर नाचते हुए या उल्टा नजर आता है | जिसका असर उसकी बोलने,पढने व लिखने की क्षमता पर पड़ता है | ऐसे बच्चे अक्सर‎ ‎'b' को ‎'p' या ‎'q' और '6' की संख्या को '9' की तरह पढता या लिखता है |

ऐसे में दुसरे बच्चे उन्हें छेड़ते या चिढाते है तो उसमे मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती है | इस तरह के बच्चे अपने मन को एकाग्र नहीं रख पाते है |
उनका ध्यान आसानी से बिखर जाता है | ज्यादा से ज्यादा १० से १५ मिनट के बाद वो वर्तमान काम से उकता जायेगा और कोशिस करेगा कहीं खेलने या कोई शरारत करने का | स्कुल में हंसी के पात्र बनने से बच्चा स्कुल जाने से कतराने लगता है | उसमे हीन भावना पैदा हो जाती है और वो अपना आत्मविश्वास खो बैठता है |

इसका कारण बच्चों में पोषक तत्व की कमी हो सकता है | अगर ऐसे बच्चों में B-complex Vitamins B1,B5, B6,B12 और C और साथ अच्छे आहार पोष्टिक पूरक दिया जाये तो वो निश्चित तौर पर इस तरह के बीमारी में फायदा मिलेगा |

जड़ी-बूटी सम्बंधित उपचार के लिए हमारे पास विश्व स्तरीय एलो जेल और साथ में पोष्टिक पूरक है जिसका विवरण निचे दिया जा रहा है :-


१.एलो बिट्स न पिचेज :- इससे आत्मसात्करण में सुधर,पौष्टिक,निरोधक प्रणाली में मजबूती आएगी |
२. ओमेगा ३ :- एकाग्रता की कमी दूर करेगा और तंत्रिकाएँ मजबूत करेगी |
३. रोयल जेली :- मल्टीविटामिन है, दबाब-तनाव में कमी,तंत्रिका संचार में सुधर करेगी |
४. जिनकगो प्लस :- स्मरणशक्ति और मस्तिष्क के क्रियाकलाप में सुधार |


ओमेगा ३ का स्तर कम होने के वजह से बच्चों के मानसिक विकाश में ज्यादा फर्क पड़ता है |


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मिलावटी खाद्य पदार्थ सेहत से खिलवाड़ |


आज बाजार में बिक रही हर चीज में मिलावट है , दालें,अनाज,दूध,घी से लेकर सब्जी और फल तक कोई भी चीज मिलावट से अछूती नहीं है |
ये मिलावट इतनी बारीकी से की जाती है कि मूल खाद्य पदार्थ तथा मिलावट वाले खाद्य पदार्थ में भेद करना काफी मुश्किल हो जाता है |मिलावट युक्त खाद्य पदार्थ का उपयोग करने से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा शरीर में विकार उत्पन्न होने कि आशंका बढ़ जाती है |
आमतौर पर प्रतिदिन इस्तेमाल किए जाने वाले अनाज भी हानिकारक रसायनों के प्रभाव से अछूते नहीं है , हर अनाज में कुछ प्रतिशत रसायन जरूर रहता है |

विगत कुछ दिन फरीदाबाद के समाचार पत्र के मुख्य शीर्षक था " मसालों का गरबरझाला" | अलग-अलग जगह से वो मसालों का नमूना लिए थे और जब उसे प्रयोगशाला में जाँच किया गया तो उसमे तकरीवन 60 प्रतिशत मसाला में कुछ न कुछ मिलावट पाया गया |
दरअसल उन मुनाफखोड़ों /मिलावट करने वाले को ये नहीं पता है जो वे दुसरे लोगों के लिए बेच रहे है वो उनके सगे-सम्बंधित भी खा कर अपनी जान मुसीबत में डाल रहा होगा |
वे लोग इस तरह से मिलावटी खाद्य पदार्थ को परोसकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है | ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार को सख्त कदम उठानी चाहिए जो खुलेआम लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे है |

किसी भी खाद्यपदार्थ में कोई रासायनिक या बाहरी अन्य चीज मिलाने से उसकी गुणवता में कमी आ जाती है ,तो उस खाद्य पदार्थ को मिलावटयुक्त पदार्थ कहा जाता है |
जैसे दूध में पानी या यूरिया मिलकर बेचना ,मसलों में बुरादा रंग अदि मिलाना इस प्रकार के मिलावटी पदार्थ में पोषक तत्व नष्ट हो जाते है | कभी-कभी अनुचित तरीके से संग्रहित किये गए भोज्य पदार्थ से पोषक तत्व नष्ट हो जाते है |

कई ऐसे खाद्य सामग्री है जिसे बनाते समय कपडा धोने वाले सोडे का प्रयोग किया जाता है | इस प्रकार का सोडायुक्त सामग्री पाचन तंत्र और रक्तचाप के लिए नुकसानप्रद है |
इस प्रकार तुरंत मिलावटी आंटा, दाल बड़ा, दही बड़ा, गुलाब जामुन, ढोकला आदि बनाए जाते है | आता के साथ अलग पुडिया में उसकी चटनी और मसाला होता है | इसमें मनमानी मिलावट की गई होती है इस प्रकार की सामग्री सेहत के लिए अत्यंत हानिकारक होती है |

फलों को जल्दी पकाने के लिए पेस्टी साइड्स का इस्तेमाल ,सब्जियों को जल्दी उगाने और बढाने के लिए रसायनों का दुस्प्रभाव भी शरीर पर पड़ता है | सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के तमाम प्रयासों के बावजूद खानपान के सामन में मिलावट आम बात हो गई है |

खाद्य पदार्थ व मिलावटी सामग्री-------------
मिर्च पाउडर -------- इसमें लाल रंग व भूसा तथा ईट और बालू का चूर्ण मिलाया जाता है | इसकी जांच के लिए एक ग्लास पानी में एक चम्मच मिर्च पाउडर मिलाये |
अगर पानी का रंग लाल हो जाता है तो यह मिलावटी समझे | इसमें ईट या बालू का चूर्ण होगा तो सतह में इकठ्ठा हो जायेगा | कई बार लाल मिर्च पाउडर में रोडामाइन बी मिलाया जाता है | इससे यकृत,गुर्दे व तिल्ली प्रभावित होती है

आटा------------------ इसमें रेत, चॉक पाउडर अदि मिलाया जाता है | अगर आटा गूंधने में पानी अधिक लगता हो ,रोटियां अच्छी तरह फूलती है और स्वाद मीठा हो तो शुद्ध है |

चना और अरहर की दाल ----- दालों में प्रायः खेसारी दाल की मिलावट की जाती है | खेसारी दाल में एक विशेष प्रकार के जहरीला रसायन होता है | इसके सेवन से स्नायु कमजोर पड़ जाते है | पाचन तंत्र प्रभावित होता है गुर्दे में पथरी होने की आशंका रहती है |

विभिन्न मसाले -------- विभिन्न मसालों में कंकड़ ,पत्थर ,रेत, मिटटी, लकड़ी का बुरादा अदि मिलकर बेचे जाते है | इससे आहार तंत्र के रोग आंत और दांत प्रभावित होते है |

चायपती----------- इसमें कृत्रिम रंग , लौह चूर्ण तथा प्रयोग हो चुकी चाय की पतियों,का पाउडर मिलाया जाता है | इससे आहार तंत्र और पाचनतंत्र प्रभावित होता है |

काली मिर्च----------------- इसमें पपीते के बीजों का मिश्रण किया जाता है |

दूध -------- दूध में सफ़ेद रंग, पानी, यूरिया, वाशिंग पाउडर, आदि मिलकर बेचा जाता है | दूध में मिले यूरिया से किडनी फेल हो सकती है |

शहद ------------- शहद में गुड़, अथवा खांड की चाशनी ,तथा शक्कर की मिलावट की जाती है |

मावा - ,शुद्ध घी,खाद्य तेल,हल्दी,कॉफ़ी जीरा इत्यादि सब में कुछ न कुछ मिलावट किया जाता है |

मसाला या खाद्य पदार्थ खरीदते समय ब्रांडेड,और भरोसेमंद दुकान का चुनाव करनी चाहिए |


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जड़ी-बूटी ( अलसी/तीसी दिव्य शक्ति से भरपूर )-भाग 2



इससे पहले के लेख में मैंने आपको अलसी के गुण से अबगत कराया है | आज आपको इसके औषधीय गुण के बारे में चर्चा करेंगे | चुकी किसी भी वनस्पति में अगर गुणों की भंडार हो तो उसके उपयोग से रोग से पीड़ितों को लाभ मिलेगा | ऐसी कई बीमारियाँ है जो अपने आप में लाइलाज कहा जा सकता है पर आप इसके उपयोग से निश्चित तौर पर आपका फायदा मिलेगा |

कमर तथा जोड़ों का दर्द ------------------- अलसी ( तीसी ) के तेल में सोइठ का चूर्ण तथा नमक मिलाकर गर्म करके मालिश करने से कमर तथा पीठ दर्द दूर हो सकता है | अथवा अलसी के तेल को सिद्ध करके रख ले ,जरुरत पड़ने पर इसका प्रयोग करें | सिद्ध करने की विधि इस प्रकार है :- २५० ग्राम तीसी के तेल में १५ ग्राम शोंठ चूर्ण व १५ ग्राम नमक डालकर धीमी आग पर पकाई | जब धुँआ उठने लगे तो इसे उतार कर शीशी में बंद करके रख ले | इसीस तेल का मालिश से पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द ,मसल्स में दर्द,करना |

पीसी हुई अलसी में इसबगोल मिलकर लेप लगाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है |
सिरदर्द------------- पीसी हुई अलसी को ठंढे पानी में मिलकर उसका लेप बनाकर सर के ऊपर लगाने से दर्द से रहत मिलती है |

कान दर्द -------------- अलसी ( तीसी ) के काढ़े को छानकर उसमे प्याज का रस मिलाकर कान में डालने पर कान दर्द में आराम होता है |

आँख के लाल होने पर
-------------- पीसी हुई तीसी को आँखों के कोरों पर लगाने से लालिमा से छुटकारा मिलता है |

श्वास और दमा -------- इस परिस्थिति में ५ ग्राम अलसी को ५० मिली लीटर पानी में उबालकर उस पानी को सुबह-शाम दो बार ले | इस कार्य को करने के लिए तीसी और पानी को रात्रि में फुलाने के बाद उस जल को सुबह उबल कर सेवन करना चाहिए | इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को ३ ग्राम तीसी लेकर इसे २५० ग्राम जल में अच्छी तरह उबल ले | पुनः इस जल को एक घंटे तक ढककर रखने के बाद शहद मिलकर सेवन करें, या सुखी खांसी व दम के लिए अत्यंत उपयोगी है |

सर्दी-जुकाम -------- भुनी तीसी के चूर्ण को शहद के साथ लेने से जुकाम में लाभ होता है ,साफ की हुई तीसी को कढाई में भुने | जब तीसी का सुगंध आने लगे तक इसे आग से उतार कर सूक्ष्म चूर्ण बना ले और फिर उसमे अलसी के बराबर मिश्री मिलाये |मिश्री और तीसी के इस मिश्रण १०-१५ ग्राम की मात्र को दिन में दो बार गर्म पानी के साथ ले , यह सर्दी जुकाम ,कफ में फायदेमंद होगा |

वातजनित रोगों में तीसी ------ यह अत्यंत उपयोगी औषधि है , इसके लिए ५० ग्राम तीसी को कडाही में भुन ले,फिर इसे चूर्ण करें ,इसमें ५० ग्राम मिश्री मिलाए,फिर १० ग्राम लाल मिर्च मिलकर इसकी ३ से ६ ग्राम की गोली तैयार करें , इसकी एक छोटी गोली बच्चे को अवाम बड़ी गोली व्यस्क को सुबह दे, इससे कफ और वातरोग में रहत मिलती है ,इस गोली को लेने के एक घंटे तक पानी का सेवन नहीं करना चाहिए |

सुजाक ------------- शुद्ध तीसी का ४ से ६ बूंद तेल नियमित सुबह-शाम शिशन पर मवाद साफकर लगाने से गिनोरिया ( सुजाक) ठीक हो जाता है |

मूत्र विकार ----------------- मुलेठी और तीसी की समान मात्रा लेकर उसे पीसकर चूर्ण बना ले,इस चूर्ण की ४० से ५० ग्राम मात्रा १ लीटर पानी में उबले ,फिर इसे अछि तरह ठंढा कर,इसे छानकर बोतल में सुरक्षित रख ले,इस जल की २३ से ३० ग्राम मात्रा तिन-तिन घंटे के अन्तराल पर सेवन करें, इससे पेशाब सम्बंधित जलन,दर्द,मवाद,रक्त आदि की शिकायत ठीक हो जाएगी |


वीर्य रोग ------- इसमें तीसी को कलि मिर्च और शहद के साथ सेवन करने से पुरुषों में वीर्य और शुक्रानुजनित विकार दूर हो जाते है |

जलने पर-------- शुद्ध तीसी के तेल के साथ चुने के पानी को लेकर इसे अच्छी तरह से फेंटे,यह सफ़ेद मलहम की तरह हो जायेगा ,इसे जली हुई जगह पर दिन में दो बार लगाए, इससे जलन और दर्द से निजत मिलेगी |

गांठ और ट्यूमर ---------- तीसी व हल्दी के चूर्ण को पानी या दूध में मिलकर सुगमता से पका कर लेप बना ले ,इस गर्म लेप को पान के पते पर रखकर बांधे,इससे गांठ और ट्यूमर या गांठ वाली जगह पर रखकर बांधे, यह क्रिया दिन में ४-५ बार करते रहे ,इससे गांठ और ट्यूमर के दर्द और जलन से छुटकारा मिलेगा, यह मवाद नहीं बनने देगा |

ऐसा लगता है की एलोवेरा जेल और इसके पौष्टिक पूरक अगर नियमित कोई ब्यक्ति सेवन करें तो उन्हें ऐसी वैसी कोई भी बीमारियाँ कभी नहीं हो सकता |और साथ में अलसी जैसे महानतम जड़ी-बूटी वाली औषधि | यह मानव जाती के लिए इस धरती पर वरदान स्वरुप है | आहार और दिनचर्या को ठीक कर मनुष्य जीवन पर्यंत सुखी रह सकता है |

सावधानी ---------- तीसी के बीज में विषैला ग्लुकोसाइड पाया जाता है ,अतः अधिक मात्रा में इसे पशुओं को खिलाना खतरनाक है |
कच्ची तीसी का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए ,क्योंकि इसमें पायी जाने वाली हाइड्रोजन साइनाईट विषाक्त प्रभाव डालती है |



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जड़ी-बूटी ( अलसी/तीसी दिव्य शक्ति से भरपूर )


मेरी जिज्ञासा तीसी के बारे में इसलिए बढ़ा जब सुना की इसके अंदर अपार शक्ति है जैसे की प्रोटीन्स,विटामिन,ओमेगा-३ ओमेगा-६,लिग्नेन ,फैबर इत्यादि -------
आजकल अलसी ( तीसी ) के बारे में समाचारपत्र,टीवी ,इंटरनेट के माध्यम से बहूत कुछ सुनने को मिल रहा है | यह शीत ऋतू में पैदा होने वाली एक वर्षीय तिलहन फसल है | अपने देश में इसका पैदावार काफी मात्रा में होती है | अलसी यानि तीसी के फुल नीले रंग का होता है | इसके पाँच हिस्से होते है ,इनमे चपटे व भूरे रंग के बीज होते है | इन्ही बीजों को निकालकर खाद्य पदार्थ बनाने व तेल निकालने के लिए किया जाता है | विश्व स्वास्थ्य संगठन ( W.H.O.) ने अलसी को सुपर स्टार फ़ूड का दर्जा दिया है |

तीसी की ढेरो प्रजातियाँ पायी जाती है | कुछ प्रजातियाँ गर्म मौसम में भी उगाए जाते है |बीज से तेल व खली प्राप्त की जाती है | इसके तेल से बिभिन्न प्रकार के खाद्य सामग्री तैयार की जाती है जो अत्यंत स्वादिष्ट व कोलेस्ट्रोल रहित होते है |

अलसी का बोटानिकल नाम है लिनम युजिटेटीसिमम ( Linum Usitatissimum ) यानि अति उपयोगी बीज है | इसे अंग्रेजी में लिनसीड ( Linseed ) या फ्लेक्स्सीड (Flexseed), गुजराती में जवास,कन्नड़ में अगसी,बिहार में तीसी,बंगाल में तिशी ,तेलगु में अविसी जिन्जालू,मलयालम में चेरुचना विदु,तमिल में अली विराई और उड़िया में पेसी कहते है |

तीसी में प्रचुर मात्रा में रोगनिवारक व पोषक तत्व पाए जाते है
जिनमे कर्बोहाईड्रेट , शुगर ,रेशा, वसा,प्रोटीन, विटामिन्स , कैल्शियम, पोटाशियम,मैग्नेशियम,फोस्फोरस, लोहा, जस्ता, आदि प्रमुख है | इसके अलावा प्रत्येक १०० ग्राम तीसी में ऊर्जा ५३० कैलोरी पायी जाती है |

पहले इसका प्रयोग भोजन, कपडा, व रंगरोगन बनाने के लिए होता आया है | अलसी में अपार पोष्टिक तत्व है | यह बचपन से बुढ़ापे तक के लोगों को फायदेमंद है | महात्मा गाँधी ने स्वास्थ्य पर भी शोध किया व बहूत से पुस्तक भी लिखी | उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसने चमतकारी गुणों को पहचाना और एक पुस्तक में लिखा था ------" जहाँ अलसी का सेवन किया जायेगा ,वह समाज, स्वास्थ्य व समृधि रहेगा |

तीसी में लिग्निन और ओमेगा-३ वसा अम्ल पाया जाता है ,यह कई तरह के ट्यूमर को बढ़ने से रोक देता है | एक शोध से यह पता चला है की इसमें कैंसर रोधी तत्व भी पाए जाते है |स्तन कैंसर व प्रोस्टेट कैंसर में भी उपयोगी है | यह डायबीटिज में रक्त शर्करा के स्तर को स्थिर रखता है | इससे रक्त संचार में वृद्धि होती है और खून ज्यादा गाढ़ा नहीं होने देता जिससे उसमे थक्के नहीं जमते | यह ह्रदय रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है,सर्दी-जुकाम में भी उपयोगी है | तीसी खाने वाले व्यक्ति को ह्रदय घाट की सम्भावना बहूत कम रहती है |


यह थोड़ी मिठास के साथ हल्का सुगन्धित होता है,यह तैलीय,उष्ण,शक्तिवर्धक,भरी तथा कामशक्ति को बढ़ाने वाला है | थोड़ी मात्रा में ली गई तीसी वात,कफ, पित, और नेत्र रोगों में लाभकारी है |

हमारे शारीर के स्वास्थ्य संचालन के लिए ओमेगा-३ व ओमेगा-६ दोनों ही आवश्यक होते है | अब यूँ मान लीजिये ओमेगा-३ नायक,और ओमेगा-६ खलनायक है | ठीक उसी प्रकार जैसे एक अच्छी फिल्म के लिए नायक और खलनायक दोनों ही आवश्यक है | पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-६ की मात्रा बढती जा रही है | और ओमेगा-३ की कमी होती जा रही है |

मल्टीनेसनल कंपनियों द्वारा परोसे जा रहे डिब्बा बंद फ़ूड व जंक फ़ूड ओमेगा-६ फैटी एसिड से भरपूर होते है | शोध से पता चला है की हमारे विकृत हुई आहार शैली से हमारे भोजन में ओमेगा-३ की कमी और ओमेगा-६ बढ़ोतरी के वजह से हम हाई ब्लडप्रेशर, हार्ट अटैक,स्ट्रोक,डायबिटिज, मोटापा, गठिया, डिप्रेसन, दमा, कैंसर आदि रोगों के शिकार हो रहे है | ओमेगा-३ की यही कमी रोज 30-60 ग्राम अलसी ( तीसी) खाकर आसानी से पूरी कर सकते है |
इसी कारण अलसी को सुपर स्टार फ़ूड का दर्जा दिलाते है |

अलसी हमारे दिमाग को शांत,चित्प्रसन्न रखता है | तनाव दूर होता है,बुद्धिमता व स्मरण शक्ति बढती है तथा क्रोध नहीं आता | इससे एक दैविक शक्ति और एनर्जी का प्रवाह होता है | अलसी बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि, सेक्स उतेजना में कमी ,शीघ्रपतन आदि में भी बहुत ही लाभदायक है | यदि माँ के स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो उसे अलसी खिलाने के 24 घंटे के भीतर ही स्तन में दूध आने लगता है | यदि माँ अलसी सेवन करती है तो उसके दूध में ओमेगा-३ प्रयाप्त मात्रा में रहेगा जिससे बच्चा अधिक बुद्धिमान व स्वस्थ्य पैदा होता है | एक शोध से यह भी पता चला है की जल्दी ही लिग्नेन एड्स का सस्ता,सरल और कारगर इलाज साबित होने वाला है |

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Aloe Vera Gel ( एलो जेल पाचन प्रणाली के लिए अचूक औषधि )

आजकल पाश्चात्य शैली के शौचालय का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है क्यूंकि लोगों को इससे सुविधा होती है | शौच जाते समय पैरों या घुटनों को कष्ट नहीं उठाना पड़ता है | फिर आराम ही आराम ,बेफिक्र होकर वहीँ बैठकर अखबार पढो या लैपटॉप पर काम करो या लोगों से मोबाईल पर व्यव्शायिक बाते करों | अब अखबार पढने या अन्य कार्य करने की प्रक्रिया में चाहे मूल क्रिया को ही भूल जाओ | पर क्या वास्तव में ये ठीक है ? शायद नहीं | कितनी विकृत हो गई है हमारी जीवन शैली और हमारी आदतें ? जीवन में सम्पूर्ण परिवर्तन व उपचार के लिए विकृत विचारों के साथ-साथ विकृत जीवनशैली और आदतों को बदलना भी अनिवार्य है |

शौच जाने के पारंपरिक तरीके में हम उकडू बैठकर निवृत होते है |इससे पैरों का व्यायाम भी हो जाता है | हम जितनी बार मल-मूत्र विसर्जन के लिए उकडू होकर बैठकर निवृत होते है उतने ही बार पैरों का ही नहीं कूल्हों तक का सभी अंगों व उपांगों का व्यायाम हो जाता है | पैरों के बल बैठकर शौच जाते समय एक सबसे महत्वपूर्ण योगिक क्रिया भी स्वतः हो जाती है और वो है पवनमुक्त आसन का अभ्यास |जब हम पवनमुक्त आसन करते है तो पीठ के बल लेटकर पैरों को मोड़कर पेट पर दबाव डालते है जिससे आँतों में व्याप्त दुर्गन्धयुक्त वायु बहार निकल जाती है |

उकडू बैठकर शौच जाते समय भी हम पवनमुक्त आसन की अवस्था में ही होते है | शौच के बाद यदि पैरों अथवा जंघावों का दबाव उदर या आंतों पर डालेंगे तो इससे आंतो में व्याप्त दुर्गन्धयुक्त वायु बहार निकल जाएगी | यदि आंतो में मल की मात्र भी बची होगी तो वो भी बहार आ जाएगी और इस प्रक्रिया में हमें पवनमुक्त आसन का पूरा लाभ मिलेगा |


पाश्चात्य शैली के शौचालय में ये लाभ हमें नहीं मिल पाता है बल्कि शारीर के बिभिन्न अंगो की गति कम होने के कारण शरीर में जड़ता ,निष्क्रियता व्याप्त होने लगती है जिससे बीमारी ठीक होने के बजाय और भी बढ़ने लगती है |


पाश्चात्य शैली के शौचालय में एक सबसे बड़ी कमी और भी है और वो है स्वच्छता का आभाव | सार्वजानिक शौचालय में पाश्चात्य शैली के शौचालय का प्रयोग करना अत्यंत घातक है | इनमे न केवल गंदगी के कारण संक्रमण का खतरा बना रहता है अपितु पानी का भी अधिक आवश्यकता पड़ती है अतः पारंपरिक तरीके का शौचालय का प्रयोग करना ही अधिक सुरक्षित व व्यवहारिक तथा स्वास्थ्यप्रदायक है |


एक सबसे खास बात अगर सुबह-सवेरे शौच खुल कर आ जाये तो आपके दिन चर्या स्वतः ठीक हो जाता है
| शरीर में स्फूर्ति और मन अपने कार्य क्षेत्र में लगा रहता है | स्वस्थ्य आंत यानि की स्वस्थ्य तन व मन | आप शारीरिक व मानसिक दोनों रूप में चुस्त और दुरुस्त नजर आते है | मतलब साफ़ है सुबह की दिनचर्या बिलकुल स्वक्ष होना ही चाहिए अन्यथा आप शारीरिक और मानसिक रूप से दिन भर थके-थके से रहेंगे |

अगर किसी भी व्यक्ति को शौच खुल कर नहीं आने की समस्या हो यानि कब्ज़ या गैस से पीड़ित हो तो आप एलो वेरा जेल का नियमित सेवन शुरू करें | आप कुछ ही महीनो में इस तरह की बीमारी से छुटकारा पा सकते है | चुकी कब्ज़ व गैस आपके लिए साइलेंट किलर का काम करता है | 90% बिमारियों का शुरुआत पेट का साफ़ नहीं होने से होता है ,ऐसी मान्यता है | इसीलिए आप अपने आपको एलो जेल के माध्यम से पेट को स्वक्ष रखें फिर आपके जीवन में उर्जा का संचार स्वतः हो जायेगा |

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फर्जी डॉक्टर से साबधान रहे ( Aloe Vera your's family doctor )

डॉक्टर और मरीजों के बीच आज दुरी और अविश्वास इस कदर बढ़ा हुआ है की लोग हैरान परेशान रहते है |
डॉक्टर की ना तो पहले वाली भाषा रही ना ही वो सम्बन्ध जिसके लिए उन्हें भगवान् का दर्जा दिया जाता है |
इन सबके पीछे सिर्फ और सिर्फ वो खुद ही जिम्मेदार है |


सरकारी अस्पताल के डॉक्टर आज राजनेताओं की कठपुतली बन गई है ,जैसा वो चाहते है वैसा ही वो करते है जिसके वजह से समाज में उनकी गिरती छवि साफ़ नजर आ रही है |
दवा कम्पनी के प्रलोभन में आकर चिकित्सक उन कम्पनी की महँगी दवा मरीजों को लिखते है ,जिसकी पूर्ति कम कीमत की दवा से भी हो सकती है |


डॉक्टर समाज के एक कुलीन मनुष्य की श्रेणी में आते है ,लेकिन इस तरह से वे अपने आपको ही गन्दा कर रहे है |
आज दुःख होता है जब देवता का दर्जा पाने वाले चिकित्सक को दानव के रूप में देखा जाता है |
इस स्थिति के लिए वे कहीं ना कहीं स्वयं ही कसूरवार है |


डॉक्टर अपनी मूल कर्तव्य को भूल कर अक्सर वो मरीजों की आर्थिक हालात को मद्देनजर रखकर उनका इलाज करते है |
मतलब आर्थिक हालात मरीजों की डॉक्टर के लिए पहली प्राथमिकता होती है |

आज हर गली के नुक्कड़ पर एक डॉक्टर का तख्ता नजर आता है | उनके पास पर्याप्त प्रमाण पत्र नहीं होता है जिससे की वो मरीजों को उचित इलाज कर सकें | ऐसा लगता है जैसे साग सब्जी की दूकान है ,कहीं भी रेड़ी लगा दो चलना तो है ही |


जब तक देश में गरीबी और बेरोजगारी पर अंकुश नहीं लगेगी ,तबतक ऐसे झोले छाप डॉक्टर की रेड़ी फलती-फूलती ही रहेगी |
मरीजों की अज्ञानता और निरक्षरता के वजह से आज ऐसे नुक्कड़ के डॉक्टर की दुकान चमक रही है |
कई तो डॉक्टर के पास थोड़ी बहूत जानकारी हासिल कर ली और लगा दी कहीं और जगह जाकर अपनी रेड़ी |

दरअसल उन्हें मरीजों से कोई लेना देना नहीं है वो तो अपनी जेब भरने के लिए मरीजों की जान भी आफत में डाल देते है | ऐसे डॉक्टर के करतूत से कई बार मरीजों को आर्थिक और मानसिक रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ती है |


कबतक हम ऐसे पेशेवर लोगों के चंगुल में फंसते रहेंगे ? जिन्होंने डॉक्टर के पेशा को ही बदनाम कर दिया है |
जहाँ डॉक्टर के नाम से इज्जत और प्रतिष्ठा मिलती है ,वहाँ आज रोज गली के आसपास झोले छाप से लड़ते रोगी भी मिल जाते है |
कारण साफ़ है मानसिक कमजोरी , अज्ञानता , मरीजों और बिमारियों के बारे में जानकारी का आभाव , विचारों में दरिद्रता ये सब के सब झोले छाप में मिलता है |


पर क्या सरकार और डॉक्टर का संघ इसके बारे में कुछ नहीं कर सकती है ? क्या मालूम नहीं है सरकारी तंत्र को , किस तरह से तख्ता लटकाए हुए डॉक्टर गली,चौराहे पर अपनी दुकान सजाये हुए है | हमारी जागरूकता ही ऐसे गली चौराहे में मौत बेच रहे डॉक्टर से बचा सकती है |

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Aloe Vera (एलोवेरा व घृतकुमारी की औषधीय महता )


आज का युग विकाश युग है | जहाँ आबादी निरंतर घनी से घनी होती जा रही है | जहाँ जंगल हुआ करते थे आज वहां बहुमंजिला इमारत ,एवम खुबसूरत व्यव्शायिक केंद्र बन गया है | पहले शुद्ध हवा एवम जल मिला करता था पर आज हमारी खुद की कर्मों के वजह से दूषित हवा तथा जल हमें पुरूस्कार स्वरुप मिल रहा है |


दरअसल वर्तमान में होने वाला विकास पेड़-पौधों के विनाश की कीमत पर है | किसी ज़माने में अनेक प्रकार के दिव्य वनस्पतियाँ भारत में यहाँ-वहां कदम-कदम पर बिखरी पड़ी थी ,वहां आज वे सभी लुप्त है | और जो हमारे आसपास है तो उनकी दिव्यता की जानकारी नहीं है |


अमृत का नाम सुनते है मस्तिस्क में एक ऐसी काल्पनिक दृश्य उभर कर आती है जो जरा सी बूंद भर और मृत्यु को दूर कर व्यक्ति को अक्षय यौवन और अमरता प्रदान करने की क्षमता रखता है |एक ऐसा पेय पदार्थ जो मनुष्य को ओजस्वी ,तेजस्वी बना दे | उनमे इतनी रोग निवारण क्षमता बढ़ा दे कि बड़े से बड़े रोग भी उनके सामने घुटने टेक सके |


वे व्याधियां जो स्वाभाविक रूप से सभी को सताती है ,उनमे बुढ़ापा प्रथम है | वृधावस्था में सभी इन्द्रियों का कार्य क्षमता घट जाता है , इसका निराकरण करने के लिए औषधियां है ,अगर मनुष्य इस औषधि का प्रयोग अपने जीवन में करें तो पुनः वो सब कुछ प्राप्त कर सकता है जिससे बढ़ते उम्र में भी शारीरिक और मानसिक रूप से सदा युवा नजर आयेंगे |

अमृत कि चाह सभी को रही , चाहे सुर हो, असुर हों अथवा नर हों | देवासुर संग्राम के बारे में सभी जानते है | यह संग्राम ही "अमृत" पर अधिकार के लिए हुआ था | दरअसल अमृत का अविष्कार इसलिए किया गया था कि इसका प्रयोग करें तथा जरा और व्याधि से मुक्त होकर जियें | लेकिन यह देव मात्र का पेय बन गया है | यह इतना प्रसिद्ध है कि आज तक हम सब चाहते है कि काश | हमें भी अमृत का एक बूँद ही मिल जाये,लेकिन दुर्भाग्य | समय के फेरबदल में अमृत का प्रयोग कालकवलित हो गया |

हमारे बिच एक ऐसा औषधि है जो इस धरती पर अमृत सामान है | यह वो पौधा है जो आज विश्व के प्रत्येक भाग में पाए जाते है | और जिसके उपयोग से 220 प्रकार के बिमारियों में लाभ होता है | जिसका नाम है Aloevera , घ्रित्कुमारी,ग्वारपाठा, कुमारी,क्वारगंदल ,घी ग्वार इत्यादि | एलोवेरा में चमत्कारी गुण के कारण ही आज के युग का अमृत माना जाता है |




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सफलता के लिए दृढ आत्मविश्वास का होना नितान्त आवश्यक है |



सफलता का मूल मन्त्र अपने जीवन के उद्देश्य को जानना और उसे प्राप्त करने के लिए दृढ आत्मविश्वास रखना यही सफलता की ओर पहला कदम है|
यह अदम्य विचार कि मैं अवश्य सफल होऊंगा और उस पर पूरा विश्वास ही सफलता पाने का मूल मन्त्र है | याद रखिये विचार संसार की सबसे महान शक्ति है यही कारण है की सफलता पाने वाले लोग पूर्ण आत्मविश्व रखते हुए अपने कर्मों को पूरी कुशलता से करते है ,दूसरों की सफलता के लिए भी वे सदा प्रयत्नशील रहते है |

प्रत्येक विचार,प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है अच्छे का अच्छे ओर बुरे का बुरा | यही प्रकृति का नियम है | इसमें देर हो सकती है पर अंधेर नहीं | इसलिए आप सफल होना चाहते है तो अच्छे विचार मन में रखिये , सद्कर्म करिए और जरुरतमंदो की निःस्वार्थ भाव से सहायता तथा सेवा करिए | मार्ग में आने वाली कठिनाइयों,बाधाओं,ओर दूसरों की कटु आलोचनाओं से अपने मन को अशांत न होने दीजिये |

जब अपनी समस्या न सुलझे जब कोई अपनी समस्या को हल न कर सकें तो उसके लिए सबसे अच्छा तरीका एक ऐसे ब्यक्ति की खोज करना है जिसके पास उससे भी अधिक समस्याएँ हों ओर तब वह उन्हें हल करने में उसकी उसकी सहायता करें | आपकी समस्या का हल आपको मिल जायेगा | चौंकिए मत, इसे आजमाइए |

लोगों में अंधविश्वास सफलता के लिए बहूत बड़े बाधक सिद्ध होता है | मनुष्य जीवन पर्यन्त इस अज्ञानपूर्ण अंधविश्वास से चिंतित रहता है की कहीं उसे कोई धोखा न दे जाए | उसे वह ज्ञान नहीं होता की मनुष्य को स्वयं के सिवाए कोई दूसरा धोखा नहीं दे सकता,वास्तव में वह अपने ही मोह और भय के कारण धोखे में फंसता है |

हम भूल जाते है की एक परमशक्ति भी है जो सदैव हर ब्यक्ति के साथ रहती है | जब कोई ब्यक्ति किसी से कोई समझौता या अनुबंध करता है ,तो यह परमशक्ति अदृश्य और मौन रूप में एक साक्षी की तरह उपस्थित रहती है | हम इस दुनिया को धोखा दे सकते है पर इस अदृश्य शक्ति को नहीं |

इसलिए जो ब्यक्ति दूसरों को धोखा देकर या उसका शोषण करके सफलता या धन प्राप्त करना चाहता है उसे अंत में भयानक परिणामों को भुँगातना पड़ता है |
यही कारण है की संसार के सभी संतो और महापुरुषों ने निःस्वार्थ कार्य करने पर बल दिया है
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"समय की पावंदी में ही जिवन की सफलता का रहस्य निहित है |
आप समय की कद्र करेंगे तो समय आपकी कद्र करेगा |"



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कैसे प्राप्त करें तेजस्वी संतान ?

हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर आधारित है | मानव जीवन को पवित्र व मर्यादित बनाने के लिए संस्कारों का निर्माण किया गया है |

भारतीय ऋषि-मुनियों की यह धारणा रही है की प्रत्येक व्यक्ति यदि स्वयं को संस्कारवान कर ले तो पूरा समाज सुसंस्कृत और शिष्ट हो जाएगा |
हिन्दू संस्कारों की इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका है |संस्कार का अर्थ है मन-वाणी और शरीर का सुधार |
धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी हमारे जीवन में इन संस्कारों का विशेष महत्व है |

हमारे धर्मशास्त्र में मुख्य रूप से 16 संस्कारों की व्याख्या की गई है इनमे सर्वप्रथम गर्भाधान और मृत्यु उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है | विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा बहूत अंतर है लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान,पुंसवन,सिमन्तोनयन,जातकर्म,नामकरण,निष्क्रमण,अन्नप्राशन चूडाकर्म,विद्यारंभ,कर्णवेध,यज्ञोपवीत,वेदारंभ,केशांत,समावर्तन,विवाह तथा अंत्येष्टि ही मान्य है |

शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है | गृहस्थ जीवन में प्रथम प्रवेश के उपरान्त प्रथम कर्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है | गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ संतानोत्पति है | उतम संतान की इच्छा रखने वाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन-मन की पवित्रता के लिए यह संस्कार करना चाहिए | गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते है | इनमे पहले तीन( गर्भाधान,पुंसवन,सिमंतोनयन ) को अंतर्गर्भ संस्कार तथा उसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते है |

गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है | गर्भधान संस्कार के लिए रात्रि को ही उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इस समय सारी प्रकृति शांत होती है | सहवास में मानसिक एकाग्रता बनी रहती है | गर्भाधान के समय पति-पत्नी दोनों शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध व पवित्र हों ,जिसके फलस्वरूप आने वाला शिशु संस्कारवान होगा | इसके लिए सर्वप्रथम माता-पिता का सुसंस्कारी होना अति आवश्यक है |

पति-पत्नी एकांत मिलन में वासनात्मक मनोभावों से दूर रहते हुए मन ही मन आदर्शवादी उद्देश्य की पूर्ति के लिए शरीर से प्राथना करते रहें , दोनों मनोभूमि यदि आदर्शवादी मान्यताओं से भरी हुई हो तो मनचाही संतान उत्पन्न की जा सकती है | गर्भाधान के समय में अगर किसी एक में भी भय,लज्जा या अपराध का भाव रहेगा तो उसका प्रभाव संतान पर अवश्य होगा , ऐसी मान्यता है | अतः भय,लज्जा युक्त होने और सहवास के लिए तैयार न होने की स्थिति में गर्भाधान नहीं करना चाहिए |

गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार,आचार,व्यवहार,चिंतन भाव सभी को उतम और संतुलित बनाकर अनुकूल वातावरण निर्मित किया जाए | गर्भ के तीसरे माह में शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है |

गर्भ का महत्व को समझें ,वह विकासशील शिशु माता-पिता ,कुल-परिवार तथा समाज के लिए आदर्श बने सौभाग्य और गौरव का कारण बने | माता के गर्भ में आने के बाद से गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है |


महाभारत काल में अर्जुन द्वारा सुभद्रा को चक्रव्यूह की जानकारी देने और गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु उसे ग्रहण करके सीखना एक उदाहरण है जिससे गर्भस्थ शिशु के सिखने की बात प्रमाणिक साबित होती है मातृत्व एक वरदान है तथा प्रत्येक गर्भवती एक तेजस्वी शिशु को जन्म देकर अपना जीवन सार्थक कर सकती है | गर्भ संस्कार सही अर्थों में गर्भस्थ शिशु के साथ माता-पिता का स्वास्थ्य संवाद है |




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